*पश्चिम बर्दवान का औद्योगिक पुनर्जागरण: 25 एकड़ की सीमा से लेकर गुजरात मॉडल तक, 9 फैसलों में छुपा है आसनसोल-दुर्गापुर का भविष्य*
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रानीगंज :बंगाल में भाजपा की नई सरकार बनने के बाद से ही पूरे पश्चिम बंगाल में औद्योगीकरण को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है खासकर पश्चिम बर्दवान जिले में इसे और बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है कभी आसनसोल रानीगंज का यह इलाका बंगाल के औद्योगिक केंद्र का केंद्र बिंदु हुआ करता था लेकिन पिछले कई दशकों की वजह से आज आसनसोल रानीगंज औद्योगिक क्षेत्र की वह ख्याति समाप्त हो चुकी है ऐसे में फिर से इस क्षेत्र के औद्योगीकरण को पुनर्जीवित करने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किया जा रहे हैं किसी कड़ी में कल रानीगंज में आसनसोल उत्तर के विधायक कृष्णेंदु मुखर्जी आसनसोल जिला सांगठनिक भाजपा अध्यक्ष देव तनु भट्टाचार्य के साथ इस क्षेत्र के विशिष्ट व्यवसाईयों और उद्योगपतियों की एक बैठक हुई इस बैठक में राजेंद्र प्रसाद खेतान सचिन राय सहित इस क्षेत्र के तमाम विशिष्ट उद्योगपति उपस्थित थे यहां पर कई बिंदुओं पर विस्तार पूर्वक चर्चा की गई आपको बता दें कि आसनसोल-दुर्गापुर कभी पश्चिम बंगाल की औद्योगिक राजधानी कहलाता था। IISCO, चित्तरंजन लोकोमोटिव, DVC और दर्जनों छोटी-बड़ी फैक्ट्रियों ने इस क्षेत्र को देश के मानचित्र पर स्थापित किया था। लेकिन पिछले दो दशकों में जमीन की अनुपलब्धता, नीतिगत अड़चनों, ADDA और प्रशासनिक जटिलताओं के कारण यह बेल्ट अपनी रफ्तार खो बैठा। 23 अक्टूबर 2026 को हुई इंडस्ट्री डेवलपमेंट और इन्वेस्टमेंट प्रमोशन की बैठक इसी रफ्तार को वापस लाने की एक ठोस कोशिश है। इस बैठक में लिए गए 9 फैसले सिर्फ कागजी नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत बदलने वाले साबित हो सकते हैं।
*सबसे बड़ा रोड़ा – 25 एकड़ की सीमा*
आज के दौर में जब एक इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट या लॉजिस्टिक्स पार्क के लिए 100-200 एकड़ जमीन चाहिए, वहां 25 एकड़ की अधिकतम सीमा निवेशकों को वापस लौटा देती है। एक बड़ा निवेशक कभी भी अपनी जमीन को टुकड़ों में नहीं लेना चाहेगा। इस सीमा को हटाने या शिथिल करने पर विचार करना इस बैठक का सबसे प्रगतिशील कदम है। अगर यह नीति नई औद्योगिक नीति में आती है, तो आसनसोल में बड़े पैमाने पर एंकर इंडस्ट्री आ सकती है, जो अपने साथ 50-100 MSME की चेन लाती है।
*लैंड बैंक और ADDA – भरोसे की कमी को खत्म करना*
उद्योगपति का सबसे बड़ा डर है – जमीन देखी, पैसा लगाया, और बाद में पता चला कि रिकॉर्ड में विवाद है या ADDA की NOC नहीं मिल रही। एक ट्रांसपेरेंट इंडस्ट्रियल लैंड बैंक, जहां जमीन का रिकॉर्ड, बिजली-पानी-सड़क की स्थिति और आवंटन प्रक्रिया पहले से स्पष्ट हो, इस डर को खत्म करेगा। इसके साथ ही ADDA से जुड़े मुद्दों को अलग से चिन्हित कर सुलझाने का निर्णय भी अहम है, क्योंकि आसनसोल में ज्यादातर औद्योगिक जमीन ADDA के अधीन ही आती है।
*बालू – छोटी चीज, बड़ा असर*
बालू की कीमत पिछले तीन सालों में दोगुनी हो गई है। एक छोटे फैब्रिकेशन यूनिट को शेड बनाने के लिए भी आज बाजार दर पर बालू लेनी पड़ रही है, जिससे प्रोजेक्ट कॉस्ट 15-20% बढ़ जाती है। बालू को उचित और नियंत्रित दर पर उपलब्ध कराने का फैसला सीधे तौर पर कंस्ट्रक्शन कॉस्ट को कम करेगा और नए उद्योगों के लिए माहौल सुगम बनाएगा।
*हर महीने DM के साथ बैठक – जवाबदेही तय होगी*
अभी तक उद्योगपतियों की शिकायतें अलग-अलग विभागों में भटकती रहती थीं। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में मासिक औद्योगिक बैठक होने से एक सिंगल विंडो जवाबदेही बनेगी। फाइल कहां अटकी है, इसकी समीक्षा हर महीने होगी। यह मॉडल गुजरात और महाराष्ट्र में सफल रहा है।
*गुजरात मॉडल और रवींद्र भवन में निवेश मीट*
गुजरात की सफलता का मंत्र है – प्लग एंड प्ले इंफ्रास्ट्रक्चर। वहां जमीन के साथ ही सड़क, पानी और बिजली तैयार मिलती है। वहां की अध्ययन यात्रा सिर्फ घूमने के लिए नहीं, बल्कि यह सीखने के लिए है कि जमीन आवंटन 30 दिन में कैसे होता है। वहीं रवींद्र भवन में होने वाली इन्वेस्टमेंट प्रमोशन मीटिंग इस पूरे प्लान को निवेशकों के सामने पेश करने का मंच बनेगी। अगर इस मीटिंग में पश्चिम बर्दवान इंडस्ट्रियल कमेटी और कृष्णेंदु दा जैसे जमीनी समन्वयक सक्रिय रहते हैं, तो यह मीटिंग सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि MoU में बदल सकती है।
कुल मिलाकर, यह 9 सूत्री एजेंडा पश्चिम बर्दवान के लिए एक नई औद्योगिक नीति की नींव है। जरूरत है कि इन फैसलों को समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए, ताकि आसनसोल-दुर्गापुर फिर से बंगाल की औद्योगिक राजधानी बन सके।














